Tuesday, June 7, 2016

** सनातन छन्द कि नव उद्गार **

* सनातन छन्द कि नव उद्‌गार *

कर्म का मर्म, साधना-कर्म,
श्वास का धर्म, श्वास रुक जाय।
करेगा कौन? रहो अब मौन,
मिले जब भौन, अमन उर छाय॥1॥

मिटी जब आस, लखो विश्वास,
नहीं परिहास, कि अवसर जान।
मोद की गोद, असत्य विनोद,
सहज यह शोध, रुचिर पहचान॥2॥

नृत्य घट बीच, कि लो उर सींच,
पाद कुछ भींच, कि हो अवतार।
अहा! यह गंध, कि कितनी मंद?
सनातन छन्द, कि नव उद्‌गार॥3॥

मिटा मन आज, बजे उर साज,
कि कैसी लाज?, फूटते गीत।
सुनो! दे ध्यान, मधुर आह्वान,
अमर का गान, मिला अब मीत॥4॥

मिटे जब भाव, विलुप्त अभाव,
नियम की नाव, हीन आभार।
शीलहत हंस, मर गया कंश,
कृष्ण का वंश, हुआ अब पार॥5॥

रचयिता: अशोक सिंह 'सत्यवीर'
{पुस्तक: 'पथ को मोड़ देख निज पिय को' से}

आत्मज्ञान पर करो विचार

* आत्म-ज्ञान पर करें विचार *

यत्नपूत गति की अभिलाषा, हो उपलब्ध अखण्ड-अपार।
इकलौते तल पर अर्पित हो, आत्म-ज्ञान पर करो विचार।।१।।

पूर्ण शुद्ध स्थिति कहलाती,
'आत्म-ज्ञान' की दशा अमान।
उसे ज्ञान ही कह सकते हो,
'आत्मा' शब्द कहे अभिमान।

जहाँ अहंता की ध्वनि गुंजित, वहाँ कहाँ आत्मा अविकार?
इकलौते तल पर अर्पित हो, आत्म-ज्ञान पर करो विचार।।२।।

स्वत्व स्वयं ही विगलित होता,
जब अविकार अशेष रहे।
अनाकारता अनायास ही,
चिदाकाश में नित्य बहे।

ऐसे में व्यापार कहाँ हो, जब प्रियतम से हो अभिसार?
इकलौते तल पर अर्पित हो, आत्म-ज्ञान पर करो विचार।।३।।

जड़ता में आरोपित होकर,
चेतन की कर रहे उपेक्षा।
स्वरमयता सध गयी कहाँ तक,
समय-समय पर करो समीक्षा।

निर्गुण नहीं, अगुण को जानो, स्वतः घटेगा गुण अपहार।
इकलौते तल पर अर्पित हो, आत्म-ज्ञान पर करो विचार।।४।।

"सत्यवीर" विज्ञान स्वयँ का,
परखो, धरो हृदय में आर्जव।
स्रोत बोध का स्वतः मिलेगा,
विहँसे अकामता का उत्सव

जन्म-मृत्यु का भेद खुले कब? हंस उड़े कब पंख पसार?
इकलौते तल पर अर्पित हो, आत्म-ज्ञान पर करो विचार।।५।।

अशोक सिंह सत्यवीर

भ्रमर मरे अमर सरे


* भ्रमर मरे, अमर सरे *

फूल खिल गया, कि रहा शेष कुंभ, मधु भरे।
स्नात-तृप्त खग प्रफुल्ल, भ्रमर मरे, अमर सरे।।१।।

टूट रही मूर्च्छा, कि
जागृति अनुभूत यहाँ।
हो रहा प्रवेश सूक्ष्म-
तन में, अब नींद कहाँ?

लिप्ति से अलिप्ति पृथक, भूतविद्ध वस्त्र झरे।
स्नात तृप्त खग प्रफुल्ल, भ्रमर मरे, अमर सरे।।२।।

मरघट पर संज्ञाऐं,
शून्य रहीं, क्या गाऐं?
वेदना असार बनी,
पंखुड़ियाँ मुस्काऐं।

हैं प्रशून्य संकल्प, गलित जगत अमति करे।
स्नात तृप्त खग प्रफुल्ल, भ्रमर मरे, अमर सरे।।३।।

अग्नि लगी, ताप कहाँ?
स्थगित है बीज-वपन।
परिचय क्या प्रियतम का,
गर्भ कहाँ ? कहाँ सृजन?

पारस की गरिमा में, शेष कहाँ विटप हरे?
स्नात तृप्त खग प्रफुल्ल, भ्रमर मरे, अमर सरे।।४।।

"सत्यवीर" आघोषित,
जीवन की अनुभाषा।
मस्ती नित हो अखण्ड,
तब हो किसकी आशा?

नाद उठे अंतर से, जीवभाव जब मरे।
स्नात तृप्त खग प्रफुल्ल, भ्रमर मरे, अमर सरे।।५।।

अशोक सिंह सत्यवीर

फल का सहज सुलभ विज्ञान


*फल का सहज सुलभ विज्ञान *

जीवन का माधुर्य खिला नित, सतत्‌ वाह का मृदु आह्वान।
स्वर्णिम लोक प्रसारित हर पल, फल का सहज, सुलभ विज्ञान।।१।।

ध्येय दृष्टिगत रहे, कि ध्याता-
स्वयं बहे, घट जाये ध्यान।
यथा लहर को परस करे,
बन लहर स्वयं, उस वारि समान।

यही प्रगति दुर्लभ मोती है, विगलन ही अंतिम निर्वान।
स्वर्णिम लोक प्रसारित हर पल, फल का सहज सुलभ विज्ञान।।२।।

मुक्तिसाध्य उपलब्धि अपरिचित,
जगती का मिथ्यात्व तजें कब?
मुक्त गगन की प्रतिभिज्ञा में,
स्यात स्वत: छूटें सब करतब।

स्वर की लयता में अभेदगति प्राप्त करें, छूटें अभिधान।
स्वर्णिम लोक प्रसारित हर पल, फल का सहज-सुलभ विज्ञान।।३।।

सम्मोहित सारांश खिले तब,
जब जागरण प्रहार बने।
गोरस मरे खिले तब कुंदन,
पंचभूत आहार बनें ।

नाक गहे आकार स्वयं ही, पारस का अवतार प्रमाण।
स्वर्णिम लोक प्रसारित हर पल, फल का सहज-सुलभ विज्ञान।।४।।

'सत्यवीर' चिर परिचित गंगा,
लीन त्रिधारा कहाँ दिख सके?
कौन कहे 'मैं कौन'? यहाँ पर,
किस संज्ञा में शून्य लिख सके?

गहराई में आरोहण का कौन कर सके सफल बखान?
स्वर्णिम लोक प्रसारित हर पल, फल का सहज-सुलभ विज्ञान।।५।।

अशोक सिंह सत्यवीर

(पुस्तक : पथ को मोड़ देख निज पिय को )

Sunday, May 15, 2016

* नीति प्रीति का साथ मधुर *

जीवन की अमृतमय धारा, स्नेह-सलिल अभिवाहित सुर।
काँटों में फूलों की संगति, नीति प्रीति का साथ मधुर॥1॥

कृपण रहा यह अद्भुत मानव,
विकसित कहता, रहा अबोध।
धूनी चला रमाने भगकर,
ठुकराकर उर का अनुरोध।

समरसता की प्यारी रहनी, छुपा रहा आनंद प्रचुर।
काँटों में फूलों की संगति, नीति प्रीति का साथ मधुर॥2॥

जो अद्भुत मणियों का स्वामी,
ऐसा जीवन कहाँ असार?
खारा कह जीवनसागर को,
तजा श्रेय-समृद्धि अपार।

दृष्टिभेद पर प्रश्न शेष है, पर किस हेतु रहे आतुर?
काँटों में फूलों की संगति, नीति-प्रीति का साथ मधुर॥3॥

नित्य लब्धि से रहे अपरिचित,
चंचल पत पर क्यों इतराऐ?
अविरल धार गिरे अमृत की,
मृषा- तृषा हित इत-उत धाऐ।

क्रैषक कर्म अनाविल करता, गति तुरीय पर मुक्ता थिर।
काँटों में फूलों की संगति, नीति-प्रीति का साथ मधुर॥4॥

युवा हृदय, यौवनयुत मानस में,
जीवन का सत्य उभरता।
दुरुहदशाओं से मत भागो,
सच में यौवन यहीं विकसता।

'सत्यवीर' खतरों में जागो, छुपा वहीं पीयूष प्रचुर।
काँटों में फूलों की संगति, नीति-प्रीति का साथ मधुर॥5॥

अशोक सिंह 'सत्यवीर'
[पुस्तक-'पथ को मोड़ देख निज पिय को']

🌿🌺वन्दना अविराम भायी🌺🌿


🌹पंथ की रचना अगोचर, जब गिरे, औ भीति आयी।
तब हृदय की मृदु गुहा में, वन्दना अविराम भायी॥1॥🌹

🍂कब प्रमाणिक हो सकी है,
वन्दना में प्रीति कितनी?
श्वास-संचारित कथा की,
है अखण्ड प्रतीति कितनी?🍂

🌹यत्न पर अनुग्रह मिले कब? लौ अदोष रही जलायी।
तब हृदय की मृदु गुहा में, वन्दना अविराम भायी॥2॥🌹

🍂प्रेम की दुर्धर कसौटी-
पर खरे, हो सिद्ध कैसे?
सिंहिनी वरती रही है-
सिंह, रहा प्रसिद्ध जैसे।🍂

🌹शक्ति का आह्वान उर में, टेक इक जब भी बनायी।
तब हृदय की मृदु गुहा में, वन्दना अविराम भायी॥3॥🌹

🍂यत्न करके क्लान्तिमय बन,
प्रेय की अनुभूति पाकर।
छोड़ते नि:श्वास अविरत,
दिख गया कुछ-कुछ सुधाकर।🍂

🌹ज्ञान का अभिमान तज अब, जब बना विषकूट पायी।
तब हृदय की मृदु गुहा में, वन्दना अविराम भायी॥4॥🌹

🍂भेद किसको मिल सका है,
प्रिय मिले, पहचान पा ले?
शब्द में ही पथ छुपा है,
पत्थरों में मणि सँभाले।🍂

🌹'सत्यवीर' विवेक मति से, दृष्टि में दे सच दिखायी।
तब हृदय की मृदु गुहा में, वन्दना अविराम भायी॥5॥🌹

🍃अशोक सिंह 'सत्यवीर'🍃
{पुस्तक-'पथ को मोड़ देख निज पिय को'}
Published on 23 October 2014